गुस्ल के अहकाम व मसाइल

गुस्ल के फराएज़

1) इस तरह कुल्ली करना कि सारे मुंह में पानी पहुंच जाए।

2) नाक की नर्म हडडी तक पानी पहुंचाना।

3) बदन पर इस तरह पानी बहाना कि एक बाल के बराबर भी जगह बाक़ी न रहे।

कुल्ली करने और नाक में पानी डालने के मुतअल्लिक़ बाज़ उलमा की राय है कि यह वज़ू की तरह गुस्ल में भी सुन्नत है, मगर फुक़हा व उलमा की बड़ी जमाअत (इमाम अबू हनीफा, इमाम अहमद बिन हमबल) की राय है कि कुल्ली करना और नाक में पानी डालना गुस्ल में ज़रूरी है और उसके बेगैर गुस्ल ही नहीं होगा। हिन्द व पाक के जमहूर उलमा की भी यही राय है। सउदी अरब के मशहूर व मारूफ आलिमे दीन शैख मोहम्मद बिन सालेह ने भी यही कहा है। जिन उलमा ने इन दोनों आमाल को सुन्नत क़रार दिया है उनके कहने का मतलब सिर्फ यह है कि अगर कोई शख्स वाजिब गुस्ल में यह दोनों आमाल छोड़ कर गुस्ल करके नमाज़ अदा करले तो नमाजों का लौटाना ज़रूरी नहीं है, जबकि उलमा-ए-अहनाफ की राय में नमाजों का लौटाना ज़रूरी होगा।

(नोट) अगर किसी शख्स को गुस्ल से फरागत के बाद याद आया कि कुल्ली करना या नाक में पानी डालना भूल गया है तो गुस्ल के बाद भी जो अमल रह गया है उसको पूरा करले, दोबारा गुस्ल करने की ज़रूरत नहीं है। कुल्ली और नाक में पानी डाले बेगैर क़ुरान व हदीस की रौशनी में जमहूर उलमा की राय है कि गुस्ल सही नहीं होगा।

अगर गुस्लखाना में गुस्ल कर रहे हैं जहां कोई देख न सके तो नंगे हो कर गुस्ल करना जाएज़ है चाहे खड़े हो कर गुस्ल करे या बैठ कर, लेकिन बैठ कर गुस्ल करना बेहतर है, क्यूंकि इसमें परदा ज़्यादा है।

अगर नाखुन पालिश लगी हुई है तो वज़ू और गुस्ल में उसको हटा कर गुस्ल करना वाजिब है, अगर उसको हटाए बेगैर कोई औरत वज़ू या गुस्ल करेगी तो उसका वज़ू या गुस्ल सही नहीं होगा, लेकिन अगर बालों या जिस्म पर मेंहदी लगी हुई है तो उसके साथ वज़ू और गुस्ल सही है, क्यूंकि मेंहदी जिस्म में दाखिल हो जाती है जबकि नाखुन पालिश नाखुन के ऊपर रहती है और उसको हटाया भी जा सकता है और यह पानी को अंदर तक पहुंचने से रोकती है।

गुस्ल में पानी का फज़ूल इस्तेमाल न करें, ज़रूरत के मुताबिक़ ही पानी का इस्तेमाल करें। हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पानी की बहुत कम मिक़दार से गुस्ल कर लिया करते थे।

गुस्ल का मसनून तरीक़ा

गुस्ल करने वाले को चाहिए कि वह पहले दोनों हाथ धोए, फिर बदन पर जो नापाकी लगी हुई है उसको साफ करे और पेशाब भी करले। फिर मसनून तरीक़े पर वज़ू करे। वज़ू से फरागत के बाद पहले सर पर पानी डाले, फिर दाएं कंधे पर और फिर बाएं कंधे पर पानी बहाए और बदन को हाथ से मले। यह अमल तीन बार कर ले, ताकि यक़ीन हो जाए कि पानी बदन के हर हर हिस्सा पर पहुंच गया है। अगर आप शावर से नहा रहे हैं तब भी इसका एहतेमाम कर लें तो बेहतर है वरना कोई हर्ज नहीं। अगर नहाने का पानी गुस्ल की जगह पर जमा हो रहा है तो वज़ू के साथ पैरों को न धोएं बल्कि गुस्ल से फरागत के बाद उस जगह से हट कर दूसरी जगह पैर धोएं।

गुस्ल कब वाजिब होता है?

1) मनी का निकलना, यानी मनी का शहवत के साथ जिस्म से बाहर निकलना खाह सोते में हो या जागते में।

2) जिमा, यानी मर्द और औरत ने सोहबत की जिससे मर्द की शरमगाह का ऊपरी हिस्सा औरत की शरमगाह में चला गया खाह मनी निकले या न निकले।

(नोट) बीवी के साथ बोस व किनार करने में सिर्फ चंद क़तरे रतूबत के (मज़ी) निकल जाएं तो उससे गुस्ल वाजिब नहीं होता।

3) औरत का हैज या निफास से पाक होना।

सिर्फ जिमा से गुस्ल वाजिब हो जाता है खाह मनी निकले या न निकले

इन दिनों बाज़ हज़रात ने गुस्ल के वाजिब होने के दूसरे सबब के सिलसिले में जमहूर उलमा के फैसले के खिलाफ आम लोगों के सामने कुछ शक व शुबहात पैदा कर दिए हैं, इन हज़रात का मौक़िफ है कि सिर्फ सोहबत करने से गुस्ल वाजिब नहीं होता, बल्कि गुस्ल के वाजिब होने के लिए मनी का निकलना भी ज़रूरी है। मसअला की अहमियत और नज़ाकत के पेशे नज़र इस मौज़ू पर मैं दलाइल के साथ क़दरे तफसीली रौशनी डालना समझता हूं।

खैरुल क़ुरून से आज तक मुहद्दिसीन व फुक़हा व उलमा की राय है कि अगर मर्द व औरत ने इस तरह सोहबत की कि मर्द की शरमगाह का ऊपरी हिस्सा औरत की शरमगाह में चला गया तो गुस्ल वाजिब हो जाएगा, खाह मनी निकले या न निकले। 80 हिजरी में पैदा हुए मशहूर फक़ीह व मुहद्दिस हज़रत इमाम अबू हनीफा, उलमा-ए-अहनाफ और हिन्द व पाक के जमहूर उलमा का भी यही मौक़िफ है। सउदी अरब के बेशतर उलमा की भी यही राय है। इब्तिदाए इस्लाम में इस मसअला में कुछ इख्तिलाफ रहा है, लेकिन हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु के अहदे खिलाफत में अज़वाजे मुतहहरात से रुजू करने के बाद सहाबा-ए-किराम का इस पर इजमा हो गया कि महज़ जिमा से गुस्ल वाजिब हो जाता है खाह मनी निकले या न निकलेजैसा कि अक़ाएद की सबसे मशहूर किताब लिखने वाले 239 हिजरी में मिश्र में पैदा हुए हनफी आलिम इमाम तहावी ने दलाइल के साथ लिखा है।

जमहूर उलमा के दलाइल

जमहूर उलमा के बहुत से दलाइल हैं, इख्तिसार के मद्देनज़र सिर्फ तीन अहादीस ज़िक्र कर रहा हूं।

हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जब मर्द औरत के चहार ज़ानू में बैठ गया और उसके साथ कोशिश की तो गुस्ल वाजिब हो गया। (सही बुखारी), सही मुस्लिम बाबु यानिल गुस्ल की इस हदीस में यह अल्फाज़ भी वज़ाहत के साथ मौजूद है कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया खाह मनी न निकले यानी सिर्फ जिमा करने से गुस्ल वाजिब है खाह मनी निकले या न निकले। इमाम बुखारी ने (सही बुखारी) में इस हदीस को ज़िक्र करने के बाद लिखा है कि मज़कूरा बाला हदीस इस बाब की तमाम अहादीस में उमदा और बेहतरीन है और हमने दूसरी अहादीस फुक़हा के इख्तिलाफ के पेशे नज़र ज़िक्र की हैं और एहतियात इसी में है कि जिमा की सूरत में मनी के न निकलने पर भी गुस्ल किया जाए। गरज़ ये कि इमाम बुखारी ने भी इसी राय को तरजीह दी है कि सोहबत में मनी न निकलने पर भी गुस्ल किया जाए। सही मुस्लिम में वारिद हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़ौल खाह मनी न निकलेसे मसअला बिल्कुल ही वाज़ेह हो जाता है कि जिमा में मनी न निकलने पर भी गुस्ल वाजिब हो जाता है।

(नोट) दोनों की शरमगाह के सिर्फ मिलने पर गुस्ल वाजिब न होगा बल्कि मर्द की शरमगाह के ऊपरी हिस्सा का औरत की शरमगाह में दाखिल होना ज़रूरी है जैसा कि मुहद्दिसीन व फुक़हा व उलमा ने हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के दूसरे अक़वाल की रौशनी में इस हदीस के ज़िम्न में लिखा है।

हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा फरमाती हैं कि अगर दो शरमगाहें आपस में मिल जाएं तो गुस्ल वाजिब हो जाता है। (तिर्मिज़ी) यह हदीस तिर्मिज़ी के अलावा बहुत सी अहादीस की किताबों में मौजूद है। इमाम तिर्मिज़ी ने इस हदीस को ज़िक्र करने के बाद लिखा है कि सहाबा-ए-किराम (जिन में हज़रत अबू बकर, हज़रत उमर, हज़रत उसमान, हज़रत अली और हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हुम शामिल हैं) का यही क़ौल है। फुक़हा व ताबेईन और उनके बाद के उलमा हज़रत सुफयान, हज़रत अहमद और हज़रत इसहाक रहमतुल्लाह अलैहिम का क़ौल है कि जब दो शरमगाहें आपस में मिल जाएं तो गुस्ल वाजिब हो जाता है।

हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया कि जब दो शरमगाहें आपस में मिल जाएं और हशफा (मर्द की शरमगाह का ऊपरी हिस्सा) छुप जाए तो गुस्ल वाजिब हो जाता है। (मुसनद अहमद, इब्ने माजा) 260 हिजरी में पैदा हुए इमाम तबरानी ने हदीस की किताब अल मोजमुल औसतमें हदीस के अल्फाज़ इस तरह ज़िक्र फरमाए हैं कि हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया जब दो शरमगाहें आपस में मिल जाएं और हशफा छुप जाए तो गुस्ल वाजिब हो जाता है, खाह मनी निकले या न निकले।

जिन हज़रात ने गुस्ल के वाजिब होने के लिए मनी के निकलने को ज़रूरी क़रार दिया है वह आम तौर पर सही मुस्लिम में वारिद इस हदीस को दलील के तौर पर पेश फरमाते हैं पानी, पानी से वाजिब होता है जिसका यह मफहूम लेते हैं कि गुस्ल मनी के निकलने की वजह से वाजिब होता है। इमाम मुस्लिम ने इस हदीस के अलावा भी अहादीस ज़िक्र फरमाई हैं जिनसे मालूम होता है कि गुस्ल के लिए मनी का निकलना ज़रूरी है, मगर इमाम मुस्लिम ने इन तमाम अहादीस को ज़िक्र करने के लिए जो इस बाब का नाम रखा है वह यह है इब्तिदाए इस्लाम में मनी के निकले बेगैर महज़ जिमा से गुस्ल वाजिब न था मगर वह हुकुम मंसूख हो गया और अब सिर्फ जिमा से गुस्ल वाजिब हैइमाम मुस्लिम के इस बाब के यह नाम रखने से मसअला खुद ही रोज़े रौशन की तरह वाज़ेह हो गया कि इब्तिदाए इस्लाम में गुस्ल वाजिब न था, बाद में वह हुकुम हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मंसूख करके इरशाद फरमा दिया कि मनी निकले या न निकले, सिर्फ जिमा से ही गुस्ल वाजिब हो जाएगा। इमाम मुस्लिम ने इस मौक़ा पर यह भी लिखा है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की एक हदीस दूसरी हदीस को मंसूख कर देती है जिस तरह क़ुरान की एक आयत दूसरी आयत से मंसूख हो जाती है। सही मुस्लिम की सबसे ज़्यादा मशहूर शरह लिखने वाले इमाम नववी रहमतुल्लाह अलैह ने लिखा है कि इमाम मुस्लिम का इस बात को ज़िक्र करने का असल मक़सद यह है कि पहली अहादीस मंसूख हैं क्यूंकि बाद की अहादीस में सराहत मौजूद है खाह मनी निकले या न निकले, महज़ हशफा अंदर जाने से मर्द और औरत दोनों पर गुस्ल वाजिब हो जाता है और इसी पर इजमा-ए-उम्मत है। नीज़ हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से जब सवाल किया गया तो उन्होंने यही फरमाया कि मर्द व औरत की शरमगाह के मिलने से गुस्ल वाजिब हो जाता है, मैं और हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम भी ऐसा ही किया करते थे।

इमाम तिर्मिज़ी ने भी इसको तसलीम किया है कि इब्तिदाए इस्लाम में मनी के निकले बेगैर महज़ जिमा से गुस्ल वाजिब न था, मगर वह हुकुम मंसूख हो गया और अब सिर्फ जिमा से गुस्ल वाजिब हो जाता है चुनांचे इमाम तिर्मिज़ी मशहूर व मारूफ सहाबी और कातिबे वही हज़रत ओबय बिन काब रज़ियल्लाहु अन्हु का फरमान अपनी किताब (तिर्मिज़ी) में ज़िक्र फरमाते हैं इब्तिदाए इस्लाम में गुस्ल उसी वक़्त फर्ज़ होता था जब मनी निकले, यह रुख्सत के तौर पर था, फिर इससे मना कर दिया गया यानी यह हुकुम मंसूख हो गया। इमाम तिर्मिज़ी लिखते हैं कि यह हदीस हसन सही है और गुस्ल के वाजिब होने के लिए इब्तिदाए इस्लाम में मनी का निकलना ज़रूरी था, मगर बाद में मंसूख हो गया। इसी तरह कई सहाबा ने रिवायत किया है। अक्सर अहले इल्म का इस पर अमल है कि अगर कोईशख्स अपनी बीवी से जिमा करे तो मियां बीवी दोनों पर गुस्ल वाजिब हो जाएगा अगरचे मनी न निकले। (तिर्मिज़ी)

खुलासा बहस

खुलफाए राशदीन, कातिबे वही हज़रत ओबय बिन काब रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत आइशा और दूसरे सहाबा-ए-किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम, मुहद्दिसीन, फुक़हा व उलमा के अक़वाल की रौशनी में ज़िक्र किया गया कि इब्तिदाए इस्लाम में मनी के निकले बेगैर महज़ जिमा से गुस्ल वाजिब न था मगर वह हुकुम मंसूख हो गया और बाद में सिर्फ जिमा से भी गुस्ल वाजिब हुआ। हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु के अहदे खिलाफत में जब यह मसअला उठा तो हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु ने जलीलुल क़दर सहाबा को मशवरा के लिए तलब किया और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने मशवरा दिया कि अज़वाजे मुतहहरात से इस मसअला में रुजू किया जाए, चुनांचे हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रुजू किया गया तो उन्हों ने फरमाया कि जब खितानखितान से तजावुज़ कर जाए तो गुस्ल वाजिब हो जाता है, यानी हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने इसकी तसदीक़ की कि गुस्ल के लिए सिर्फ मर्द की शरमगाह का औरत की शरमगाह में दाखिल होना काफी है, मनी निकलना ज़रूरी नहीं है। चुनांचे इसी के मुताबिक़ फैसला कर दिया गया और हज़रत उमर फारूक रज़ियल्लाहु अन्हु ने फरमाया कि अगर इस के खिलाफ मैंने किसी से कुछ सुना तो उसे लोगों के लिए इबरत बना दूंगा। इमाम तहावी ने इस पर तफसीली बहस की है। सउदी अरब के मशहूर व मारूफ आलिमे दीन शैख मोहम्मद बिन सालेह ने लिखा है कि सिर्फ जिमा से गुस्ल वाजिब हो जाता है, मगर बहुत सारे लोगों पर हफ्ते और महीने गुज़र जाते हैं और वह अपनी बीवी से बेगैर इंज़ाल के सोहबत करते रहते हैं और गुस्ल नहीं करते, यह इंतिहाई खतरनाक बात है। इंसान के लिए ज़रूरी है कि वह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पर अल्लाह तआला के नाज़िल करदा अहकाम की हुदूद से वाक़िफ हो। इंसान ने अगर सोहबत की तो गुस्ल वाजिब हो गया खाह मनी निकले या न निकले। (मजमूआ फतावा व रसाइल अश शैख उसैमीन बाबुल गुस्ल जिल्द 11 पेज 217)

(इन्नमल माओ मिनलमा) का हुकुम मंसूख है

जहां तक हदीस पानी, पानी से हैका तअल्लुक़ है तो यह मंसूख है जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सोहबत याफ्ता व कातिबे वही हज़रत अबोय बिन काब रज़ियल्लाहु अन्हु का फरमा (इब्तिदाए इस्लाम में गुस्ल उसी वक़्त फर्ज़ होता था जब मनी निकले, यह रुख्सत के तौर पर था, फिर इससे मना किया दिया गया, यानी यह हुकुम मंसूख हो गया)। हज़रत ओबय बिन काब रज़ियल्लाहु अन्हु का यह क़ौल इमाम तिर्मिज़ी ने ज़िक्र फरमा कर लिखा है कि यह हदीस हसन सही है। यह मसअला ऐसा ही है कि इब्तिदाए इस्लाम में आग पर पकी हुई चीज़ खाने से वज़ू टूट जाता था मगर माद में यह हुकुम मंसूख हो गया, पहले हुकुम से मुतअल्लिक़ आहदीस भी हदीस की किताबों में मौजूद हैं मगर उनपर अमल नहीं है। बड़े बड़े मुहद्दिसीन मसलन इमाम बुखारी, इमाम मुस्लिम, इमाम तिर्मिज़ी और इमाम नववी रहमतुल्लाह अलैहिम ने इसका एतेराफ किया है कि यह हुकुम मंसूख हो गया है या यह कहा जाए कि इस हदीस का तअल्लुक़ एहतिलाम से है, यानी अगर किसी शख्स को एहतिलाम हो जाए तो गुस्ल वाजिब है। इस सूरत में इस हदीस का मतलब होगा कि पानी (गुस्ल) पानी (एहतिलाम) की वजह से वाजिब है, या यह कहा जा सकता है कि यह हदीस जिमा के लिए मंसूख हो चुकी है लेकिन एहतिलाम के लिए अब भी वाजिबुल अमल है और ऐसा बकसरत होता है कि एक हदीस के बाज़ जुज़इयात मंसूख और बाज़ वाजिबुल अमल हों। क़ुरान करीम की बाज़ आयात का हुकुम भी मंसूख है लेकिन इसकी तिलावत क़यामत तक बाक़ी रहेगी।

मुझे इस मसअला में बहुत तअज्जुब होता है कि हमारे बाज़ भाई जो हदीस का इल्म बुलंद करके इस पर अमल करने की दावत तो देते हैं लेकिन इस मसअला में बावजूद कि अहादीस में ही वज़ाहत मौजूद है कि यह इब्तिदाए इस्लाम में था बाद में मंसूख हो गया लेकिन 1400 साल के बाद भी अपनी गलती पर मुसिर हैं हालांकि दलाइले शरइया की मौजूदगी के बावजूद इहतियात का तकाज़ा भी यह है कि गुस्ल को वाजिब क़रार दिया जाए, ताकि इंसान नापाकी की हालत में सारी दुनिया का चक्कर न लगाता फिरे और इसी हाल में नमाज़ न पढ़ता रहे। इमाम मुस्लिम ने इस बहस पर जो बाब बांधा है वह इस तरह है इब्तिदाए इस्लाम में मनी के निकले बेगैर महज़ जिमा से गुस्ल वाजिब न था मगर वह हुकुम मंसूख हो गया और अब सिर्फ जिमा से गुस्ल वाजिब हैइमाम मुस्लिम ने मसअला रोज़े रौशन की तरह वाज़ेह कर दिया कि इब्तिदाए इस्लाम में गुस्ल वाजिब न था, बाद में वह हुकुम पानी, पानी सेहुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मंसूख करके इरशाद फरमाया मनी निकले या न निकलेसिर्फ जिमा से गुस्ल वाजिब हो जाएगा। गरज़ ये कि मुहद्दिसीने किराम खास कर इमाम बुखारी, इमाम मुस्लिम और इमाम तिर्मिज़ी अलैहिर रहमा की वजाहतों से यह मसअला बिल्कुल वाज़ेह हो गया। इमाम नववी जैसे मुहद्दिस ने भी यही लिखा है कि जमहूर सहाबा और उनके बाद के उलमा ने भी यही कहा है कि यह हुकुम मंसूख है।

सउदी अरब के मशहूर आलिम शैख मोहम्मद बिन सालेह से जब मज़कूरा मसअला पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि उलमा का इजमा है कि जिमा से गुस्ल वाजिब हो जाता है खाह इंज़ाल हो या न हो और उन्होंने दलील के तौर पर सही बुखारी व सही मुस्लिम में वारिद उस हदीस का ज़िक्र किया जो मैंने जमहूर उलमा के दलाइल के ज़िम्न में सबसे पहले ज़िक्र की है और फरमाया कि (रियाजुस सलेहीन के मुसन्निफ और मशहूर मुहद्दिस) इमाम नववी ने लिखा है कि इस हदीस के मानी यह हैं कि मर्द की शरमगाह के ऊपरी हिस्सा के औरत की शरमगाह में जाते ही गुस्ल वाजिब हो जाएगा खाह मनी निकले या न निकले। बाज़ सहाबा का इसमें इख्तिलाफ था, मगर बाद में इजमा हो गया जैसा कि ज़िक्र किया गया। और शैख मोहम्मद बिन सालेह ने फरमाया कि यह हदीस मनी न निकलने पर भी जिमा से गुस्ल के वाजिब होने में सरीह है और जो हज़रात जिमा में इंज़ाल न होने पर गुस्ल नहीं करते वह गलती पर हैं। नीज़ सउदी अरब की लजना दाइमा के फतावा (5/314) में लिखा है कि औरत की शरमगाह में मर्द की शरमगाह के ऊपरी हिस्सा के दाखिल होने पर गुस्ल वाजिब हो जाएगा खाह इंज़ाल हो या न हो।

अल्लाह तआला हम सबको क़ुरान व हदीस सही समझने वाला और उस पर अमल करने वाला बनाए, आमीन।

मुहम्मद नजीब क़ासमी (www.najeebqasmi.com)